
विहान के होठ अब भी प्राची के होठों पर टिके हैं। वक़्त जैसे थम गया हो, दुनिया की हर आवाज़ जैसे कहीं खो गई हो। वो दोनों एक-दूसरे को इस तरह किस करते हैं जैसे यही आख़िरी पल हो। अचानक विहान उसे अपनी बाहों में उठा लेता है, और प्राची बिना झिझके अपने पैर उसके चारों ओर लपेट लेती है। उनके बीच की दूरी अब खत्म हो चुकी थी – सिर्फ़ साँसे थीं, धड़कनें थीं, और एक गहरी चाहत थी, जिसे अब कोई नाम नहीं देना था।
विहान धीरे से उसे अपनी बाहों से उठाकर बेड पर लिटा देता है, जहां चारों ओर गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखरी होती हैं — जैसे यह पल पहले से सजाया गया हो सिर्फ़ उनके लिए। प्राची की साँसे तेज़ थीं, और उसकी आँखों में हल्की सी झिझक, लेकिन एक अबूझ सी चाह भी थी।


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